पापो से मुक्ति के लिए करे
जया एकादशी व्रत
भारतीय संस्कृति में व्रत का विशेष महत्व है। ऐसा मन जाता है। कि व्रत करने से मनोवांछित कामनाए पूर्ण होती है। जीवन में सुख -शांति के लिए अधिकांश महिलाये विविध व्रत रखती है। जिनमे से माघ शुक्ल पक्ष कि एकादशी यानि जया एकादशी का व्रत भी प्रमुख है। यह व्रत करने से न सिर्फ़प्पो से मुक्ति दिलाता है। बल्कि मन वंचित फल कि प्राप्ति भी होती है। यह व्रत करने से नीच योनियो से मुक्ति दिलाता है।
इस जया एकादशी व्रत के बारे में धर्म राज युधिष्टर भगवान श्री कृष्ण से यह कहते है। कि माघ शुक्ल एकादशी को किनकी पूजा करनी चाहिए। और इस एकादशी का क्या महत्व है। तब श्री कृष्ण उत्तर देते है। माघ शुक्ल पक्ष कि एकादशी को 'जया एकादशी ' कहते है। यह एकादशी भुत ही पुण्यदायी है। इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति नीच योनि जैसे भुत , प्रेत ,पिशाच कि योनि से मुक्त हो जाती है।श्री कृष्ण ने इस संदर्भ में एक कथा भी युधिष्ठर को सुनाई।
नंदनवन में उत्सव चल रहा था। और इस उत्सव में सभी देवता , सिद्ध संत और दिव्य पुरुष उपस्थित थे। और सुन्दर कन्याए नृत्य प्रस्तुति दे रही थी। और गायन कर रही थी। सभा में एक माल्यवांन नामक गंधर्व व् एक पुष्पवती नामक गंधर्व कन्या नृत्य कर रही थी। इस बिच पुष्पवती कि नजर माल्यवान पर पड़ी वह उस पर मोहित हो गयी। पुष्यवती सभा कि मर्यादा को भूल कर ऐसा नृत्य करने लगी कि माल्यवान उसकी ऒर आकर्षित हो। और माल्यवान गंधर्व कन्या कि भंगिमा व् अति सुंदरता को देख सुध - बुध खो बेठा और गायन कि मर्यादा से भटक गया। जिससे वह बेसुरा गाने लगा। इससे इंद्र को उनके इस भूल व् अमर्यादा पर क्रोध आ गया। और उन्होंने दोनों को श्राप दे दिया। कि आप स्वर्ग से वंचित हो जाए। और पृथ्वी पर निवाश करे। और म्रत्यु लोक में अति नीच पिशाच योनि आप दोनों को प्राप्त हो। एस श्राप के बाद दोनों पिशाच बन गये और हिमालय पर एक वृक्ष पर दोनों का निवास बन गया इन्हे पिशाच योनि में बड़ा कष्ट भोगना पड़ा। एक बार माघ शुक्ल पक्ष कि एकादशी के दिन दोनों अत्यंत दुखी थे।उस दिन वे दोनों फलाहार रहे। तभी रात्रि के समय दोनों को बहुत ही ठण्ड लग रही थी। ठंड में वह रात भर जागते रहे। व् दोनों कि ठंड के कारण मृत्यु हो जाती है। और अनजाने में ज्य एकादशी का व्रत हो जाने से दोनों को पिशाच योनि से मुक्ति भी मिल गई। और वह दोनों पहले से और भी अति सुन्दर हो गये। व् दोनों को स्वर्ग लोक में स्थान मिल गया। यह सब देख देवराज चकित रह गये। और पिशाच योनि से मुक्ति कैसे मिली ? यह पूछा , मालयवान ने कहा कि यह भगवान विष्णु कि जया एकादशी का प्रभाव है। यह सुन कर इंद्र इससे अति प्रसन्न हुऐ। और कहा कि आप अब जगदीश्वर के भक्त है। इसलिए आप अब से मेरे लिए आदरणीय है।, आप स्वर्ग में आनंद पूर्वक विहार करे।
इस प्रकार करे व्रत :-
जो श्रद्धालु भक्त इस एकादशी का व्रत रखते है। उन्हें दशमी तिथि से एक समय आहार करना चाहिए। और इस बात का ध्यान रखे कि आहार सात्विक हो। एकादशी के दिन श्री विष्णु का ध्यान करके संकल्प करे। और फिर धूप , दीप ,चंदन ,फल ,तिल एंव पंचामृत से विष्णु कि पूजा करे। पुरे दिन व्रत रखे। संभव हो तो रात्रि में भी व्रत रखकर जागरण करे। अगर रात्रि में व्रत संभव न होतो फलाहार कर सकते है। दूसरे दिन बब्रामणो को भोजन करवाकर उन्हे जनेऊ,सुपारी देकर विदा करने के बाद भोजन करे। इस प्रकार नियम निष्ठां से व्रत रखने से व्यक्ति पिशाच योनि से मुक्त हो जाता है। और उन्हें पुण्य फल कि प्राप्ति होती है।
www.panditnmshrimali.com
E-mail :- contact@panditnmshrimali.com
info@panditnmshrimali.com
Contact No. :- 09571122777, 09929391753
जया एकादशी व्रत
भारतीय संस्कृति में व्रत का विशेष महत्व है। ऐसा मन जाता है। कि व्रत करने से मनोवांछित कामनाए पूर्ण होती है। जीवन में सुख -शांति के लिए अधिकांश महिलाये विविध व्रत रखती है। जिनमे से माघ शुक्ल पक्ष कि एकादशी यानि जया एकादशी का व्रत भी प्रमुख है। यह व्रत करने से न सिर्फ़प्पो से मुक्ति दिलाता है। बल्कि मन वंचित फल कि प्राप्ति भी होती है। यह व्रत करने से नीच योनियो से मुक्ति दिलाता है।
इस जया एकादशी व्रत के बारे में धर्म राज युधिष्टर भगवान श्री कृष्ण से यह कहते है। कि माघ शुक्ल एकादशी को किनकी पूजा करनी चाहिए। और इस एकादशी का क्या महत्व है। तब श्री कृष्ण उत्तर देते है। माघ शुक्ल पक्ष कि एकादशी को 'जया एकादशी ' कहते है। यह एकादशी भुत ही पुण्यदायी है। इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति नीच योनि जैसे भुत , प्रेत ,पिशाच कि योनि से मुक्त हो जाती है।श्री कृष्ण ने इस संदर्भ में एक कथा भी युधिष्ठर को सुनाई।
नंदनवन में उत्सव चल रहा था। और इस उत्सव में सभी देवता , सिद्ध संत और दिव्य पुरुष उपस्थित थे। और सुन्दर कन्याए नृत्य प्रस्तुति दे रही थी। और गायन कर रही थी। सभा में एक माल्यवांन नामक गंधर्व व् एक पुष्पवती नामक गंधर्व कन्या नृत्य कर रही थी। इस बिच पुष्पवती कि नजर माल्यवान पर पड़ी वह उस पर मोहित हो गयी। पुष्यवती सभा कि मर्यादा को भूल कर ऐसा नृत्य करने लगी कि माल्यवान उसकी ऒर आकर्षित हो। और माल्यवान गंधर्व कन्या कि भंगिमा व् अति सुंदरता को देख सुध - बुध खो बेठा और गायन कि मर्यादा से भटक गया। जिससे वह बेसुरा गाने लगा। इससे इंद्र को उनके इस भूल व् अमर्यादा पर क्रोध आ गया। और उन्होंने दोनों को श्राप दे दिया। कि आप स्वर्ग से वंचित हो जाए। और पृथ्वी पर निवाश करे। और म्रत्यु लोक में अति नीच पिशाच योनि आप दोनों को प्राप्त हो। एस श्राप के बाद दोनों पिशाच बन गये और हिमालय पर एक वृक्ष पर दोनों का निवास बन गया इन्हे पिशाच योनि में बड़ा कष्ट भोगना पड़ा। एक बार माघ शुक्ल पक्ष कि एकादशी के दिन दोनों अत्यंत दुखी थे।उस दिन वे दोनों फलाहार रहे। तभी रात्रि के समय दोनों को बहुत ही ठण्ड लग रही थी। ठंड में वह रात भर जागते रहे। व् दोनों कि ठंड के कारण मृत्यु हो जाती है। और अनजाने में ज्य एकादशी का व्रत हो जाने से दोनों को पिशाच योनि से मुक्ति भी मिल गई। और वह दोनों पहले से और भी अति सुन्दर हो गये। व् दोनों को स्वर्ग लोक में स्थान मिल गया। यह सब देख देवराज चकित रह गये। और पिशाच योनि से मुक्ति कैसे मिली ? यह पूछा , मालयवान ने कहा कि यह भगवान विष्णु कि जया एकादशी का प्रभाव है। यह सुन कर इंद्र इससे अति प्रसन्न हुऐ। और कहा कि आप अब जगदीश्वर के भक्त है। इसलिए आप अब से मेरे लिए आदरणीय है।, आप स्वर्ग में आनंद पूर्वक विहार करे।
इस प्रकार करे व्रत :-
जो श्रद्धालु भक्त इस एकादशी का व्रत रखते है। उन्हें दशमी तिथि से एक समय आहार करना चाहिए। और इस बात का ध्यान रखे कि आहार सात्विक हो। एकादशी के दिन श्री विष्णु का ध्यान करके संकल्प करे। और फिर धूप , दीप ,चंदन ,फल ,तिल एंव पंचामृत से विष्णु कि पूजा करे। पुरे दिन व्रत रखे। संभव हो तो रात्रि में भी व्रत रखकर जागरण करे। अगर रात्रि में व्रत संभव न होतो फलाहार कर सकते है। दूसरे दिन बब्रामणो को भोजन करवाकर उन्हे जनेऊ,सुपारी देकर विदा करने के बाद भोजन करे। इस प्रकार नियम निष्ठां से व्रत रखने से व्यक्ति पिशाच योनि से मुक्त हो जाता है। और उन्हें पुण्य फल कि प्राप्ति होती है।
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